Wednesday 30 May 2012

रंगीलो राजस्थान : ब्रह्मकुमारी,अचलेश्वर महादेव और माउंट आबू का सूर्यास्त

नक़्की लेक, गुरुशिखर और देलवाड़ा मंदिर की सैर तो आपने पिछली प्रविष्टियों में की। आज के सफ़र की शुरुआत करते हैं माउंट आबू के विश्व प्रसिद्ध ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय से। ब्रह्मकुमारी संप्रदाय के इतिहास पर नज़र डालें तो इसकी उत्पत्ति का श्रोत एक सिंधी, लेखपाल कृपलानी को दिया जाता है । दादा लेखपाल या ब्रह्मा बाबा पेशे से हीरों के व्यापारी थे जिन्होंने ने 1930 के दशक में आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए पाकिस्तान के सिंध प्रांत में ओम मंडली के नाम से एक सत्संग की शुरुआत की। देश के विभाजन के बाद 1950 में उन्होंने अपना मुख्यालय हैदराबाद, सिंध से माउंट आबू बना दिया। 1969 में बाबा के निधन के बाद विदेशों में भी इस संस्था का फैलाव तेजी से हुआ। 


पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए देलवाड़ा मंदिर से गुरुशिखर के रास्ते में ब्रह्मकुमारियों द्वारा एक शांति उद्यान यानि पीस पार्क बनाया गया है। यहाँ पर्यटकों को तीस चालिस की टोलियों में इकठ्ठा कर पहले इस समुदाय की विचारधारा के बारे में बताया जाता है। वैसे अगर आपने कभी ब्रह्मकुमारियों के मूलमंत्र को ना सुना हो तो उसे पहली बार सुनना थोड़ा अजीब जरुर लगेगा।

इस संप्रदाय का मानना है कि मानवता अपने अंतिम चरण में आ पहुँची है। कुछ ही समय बाद पूरे विश्व का विनाश हो जाएगा। और फिर सतयुग का स्वर्णिम काल पुनः लौटेगा। पर इसमें हम और आप नहीं होंगे। होंगे तो वैसे ब्रह्मकुमारी जिन्होंने अपनी आध्यत्मिक शिक्षा से अपने मन का शुद्धिकरण कर लिया है। सभ्यता का ये नया केंद्र भारतीय उपमहाद्वीप होगा जहाँ से संपूर्ण विश्व इन पवित्र आत्माओं द्वारा शासित होगा। ब्रह्मकुमारी, दुनिया में भगवान शिव को सर्वोच्च आत्मा मानते हैं।  


Monday 14 May 2012

पत्थरों पर बहती कविता : दिलवाड़ा (देलवाड़ा) के जैन मंदिर

याद पड़ता है कि पहली बार माउंट आबू का नाम,  सामान्य ज्ञान की किताबों में  यहाँ दिलवाड़ा मंदिर (Dilwada Temple) होने की वज़ह से ही पढ़ा था । इसलिए मन में इस शहर का नाम सुनते ही पर्वतीय स्थल से ज्यादा  दिलवाड़ा मंदिर की छवि ही उभरती थी। वैसे किताबों में पढ़ा दिलवाड़ा, माउंट आबू में आकर देलवाड़ा (Delwada) हो जाता है।

पर भारत सरकार तो इसे दिलवाड़ा ही मानती है क्यूँकि डाक तार विभाग द्वारा ज़ारी मंदिर के डाक टिकट पर तो यही लिखा है। जैसा कि आपको पहले ही बता चुका हूँ, मैं माउंट आबू जाने के पहले राणकपुर के जैन मंदिरों से हो के आया था। वहाँ की शिल्प कला से अभिभूत हो जाने के बाद मेरे दिमाग में ये प्रश्न उठ रहा था कि जब राणकपुर इतना सुंदर है तो फिर देलवाड़ा कैसा होगा ?

गुरुशिखर से लौटने के बाद तो हम सीधे अचलगढ़ से होते हुए दिन के करीब डेढ़ बजे देलवाड़ा मंदिर पहुँचे। जैन धर्मावलंबियों के लिए ये मंदिर दिन के बारह बजे तक के लिए खुला रहता है। सामान्य पर्यटकों को इसे देखने की सुविधा इसके बाद ही उपलब्ध होती है। इसलिए यहाँ आकर सीधे सुबह में मंदिर के दर्शन का कार्यक्रम ना बना लीजिएगा।  गाड़ी से उतर कर मंदिर की पहली छवि बहुत उत्साहित नहीं करती। मंदिर की ऊँची चारदीवारी के पीछे सफेद रंग से पुते  मंदिर का शिखर ही दिखता है जो स्थापत्य की दृष्टि से कोई खास आकर्षित नहीं करता। मुझे बाद में पता चलता है कि ऐसा संभवतः मुस्लिम आक्रमणकारियों की नज़रों से मंदिर को बचाने के लिए किया गया था। इसके बावज़ूद 1511 ईं में इस मंदिर को अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण का शिकार होना पड़ा था।

चमड़े के सामान. मोबाइल और कैमरे को जमा कर हमारा समूह मंदिर के बाहर लगी पर्यटकों की कतार में शामिल हो गया था। मंदिर द्वारा नियुक्त गाइड बारी बारी से बीस पच्चीस के समूह को अंदर ले जा रहे थे। हमें अपनी बारी के लिए ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी और शीघ्र ही हम इस मंदिर समूह के अंदर थे। देलवाड़ा मंदिर समूह मुख्यतः पाँच मंदिरों से मिलकर बना है। ये मंदिर हैं विमल वसही, लूण वसही, पीतलहर , पार्श्वनाथ व महावीर स्वामी मंदिर। इनमें से प्रथम दो गुजरात के सोलंकी शासकों के समय की स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने हैं।


Wednesday 2 May 2012

मुसाफ़िर हूँ यारों ने पूरे किये अपने चार साल : क्यूँ जरूरी है हिंदी में यात्रा ब्लागिंग ?

पिछले हफ्ते मुसाफ़िर हूँ यारों का इंटरनेट पर चार साल का सफ़र पूरा हुआ। जब मैंने यात्रा को विषय बनाकर एक अलग ब्लॉग की शुरुआत की थी तब हिंदी के ब्लॉगिंग परिदृश्य में पूरी तरह यात्रा पर आधारित ब्लॉग नहीं के बराबर थे। यात्रा वृत्तांत तब भी लिखे जाते थे पर वो ब्लॉग पर अन्य सामग्रियों के साथ परोसे जाते रहे। पर खुशी की बात ये है कि पिछले चार सालों में यात्रा वृत्तांत संबंधी चिट्ठों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है।


अगर आप ब्लागिंग पर विगत वर्षों में यात्रा लेखन पर नज़र डालना चाहें तो पिछले वर्ष शालिनी पांडे द्वारा इस सिलसिले में किया गया शोध   इसकी एक झलक जरूर देगा।  प्रश्न ये उठता है कि आख़िर इन यात्रा संस्मरणों को लिखने का क्या औचित्य है जबकि किसी स्थान के बारे में जानकारी तमाम ट्रैवेल वेबसाइट्स से मिल जाती हैं?

यूँ तो किसी भी जगह जाने के पहले आज भी एक सामान्य यात्री या तो पत्र पत्रिकाओं के पर्यटन विशेषांकों की मदद लेता है या फिर इंटरनेट की उपलब्धता रही तो यात्रा संबंधी जालपृष्ठों से मिली जानकारी से होटल और घूमने वाली जगहों का निर्धारण करता है। पर ये व्यवसायिक वेब साइट्स पर्यटकों को कई बार तो सतही जानकारी मुहैया कराती हैं और साथ ही उन स्थानों से जुड़े कुछ नकरात्मक पहलुओं को बिल्कुल दरकिनार कर जाती हैं जिसे जानना किसी मुसाफ़िर के लिए बेहद जरूरी होता है। यात्रा ब्लॉग आम यात्री की इसी जरूरत को पूरा करते हैं।

घूमने फिरने की तमन्ना तो शायद सब के दिल में कभी ना कभी उठती होगी। पर रोजमर्रा की ज़द्दोज़हद में अन्य प्राथमिकताओं के नीचे कई बार ऐसी भावनाएँ दबी रह जाती हैं। पर कई दफ़े ऍसा भी होता है जब आप एक यात्री के माध्यम से किसी स्थान पर बिताए गए अनुभवों को पढ़ते हैं तो एकदम से उस स्थान पर जाने की उत्कंठा तीव्र हो जाती है। ऍसे संस्मरण कई बार आपको अपने जड़त्व (Inertia) से मुक्त करते हैं। ये तो हुई यात्रा ब्लागिंग से फ़ायदे की बात ।

अब सवाल है कि यात्रा लेखन हिंदी में क्यूँ किया जाए?  सीधे सीधे आकलन किया जाए तो एक ब्लॉगर के लिए अंग्रेजी में यात्रा लेखन करना ज्यादा फ़ायदेमंद है। अगर आप अंग्रेजी में स्तरीय यात्रा लेखन करते हैं तो ना केवल देश बल्कि विदेशों के पाठक भी आप के ब्लॉग तक पहुँचते हैं। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात ये है कि अंग्रेजी आभिजात्य वर्ग की भाषा है। इस भाषा को जानने वाले पाठकों की क्रय शक्ति हिंदी के आम पाठकों की तुलना में ज्यादा है। लाज़िमी है कि यात्रा से जुड़ी सेवाएँ प्रदान करने वाली कंपनियाँ ऐसे ब्लॉगों पर अपने विज्ञापन करने में ज्यादा रुचि दिखाएँगी। अगर आपका यात्रा ब्लॉग लिखने का उद्देश्य व्यावसायिक है तो हिंदी लेखन से वो उद्देश्य निकट भविष्य में पूरा होने से रहा। 

पर क्या हम सब यहाँ पैसों ले लिए अपना समय ख़पा रहे हैं? नहीं, कम से कम मेरा तो ये प्राथमिक उद्देश्य कभी नहीं रहा। आज भी इस देश में हिंदी पढ़ने और बोलने वालों की तादाद अंग्रेजी की तुलना में कहीं अधिक है। जैसे जैसे समाज के आम वर्ग तक इंटरनेट की पहुँच बढ़ रही है हिंदी में सामग्री ढूँढने वालों की संख्या भी बढ़ेगी। क्या हमारा दायित्व ये नहीं कि ऐसे लोगों को हिंदी में स्तरीय जानकारी उपलब्ध कराएँ जैसी कि अंग्रेजी में आसानी से सुलभ है।

यात्रा लेखन हिंदी साहित्य की पुरानी परंपरा रही है। अगर आप हिंदी में यात्रा लेखन में रुचि रखते हैं तो अपने संस्मरणों को जरूर सबसे बाँटें। हाँ कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है। आपकी लेखन शैली जो भी हो , जो कुछ लिखें शुद्ध लिखने की कोशिश करें। पर शुद्धता से भी ज्यादा एक अच्छे यात्रा लेखक का कर्तव्य है कि अपने पाठकों से अपने अनुभव इस तरह साझा करें कि पढ़ने वाले को लगे कि वो भी साथ साथ घूम रहा है। इस बात का ध्यान रखें कि एक आम पाठक की रुचि आपसे ज्यादा उस स्थान के बारे में है जिसके बारे में आप लिख रहे हैं।

चार सालों में मैंने इस चिट्ठे पर आपको भारत के विभिन्न हिस्सों की सैर कराई है और आपका प्रेम मुझे मिला है। आपको जानकर खुशी होगी कि पिछले हफ्ते राजस्थान पत्रिका और उसके पहले जनसत्ता में भी  इस चिट्ठे को स्थान मिला है।


मेरी ये कोशिश रहेगी कि अपनी यात्राओं से जो आनंद मुझे मिलता रहा है उसे आप तक पहुँचाता रहूँ। आशा है भविष्य में भी आपका साथ इस चिट्ठे को मिलता रहेगा। मुसाफिर हूँ यारों ने पूरे किए चार साल !

Thursday 26 April 2012

माउंट आबू : आइए देखें गुरुशिखर का नैसर्गिक सौन्दर्य ...

सोलह नवंबर की सुबह बादलों से भरी थी। सुबह तरो ताज़ा होने के बाद हमारा पहला लक्ष्य गुरुशिखर था। माउंट आबू आने के पहले मैंने गुरुशिखर के बारे में खास सुन नहीं रखा था। पर जो मानचित्र मुझे स्थानीय पर्यटन केंद्र से मिला था उसमें देलवाड़ा मंदिर  के आगे गुरु शिखर की ओर जाती सड़क का उल्लेख अवश्य था। नक़्शे को ध्यान से देखने से स्पष्ट था कि अगर सबसे पहले हम माउंट आबू से पन्द्रह किमी दूर स्थित इस शिखर को देख लें तो वापस लौटते समय इसी रास्ते में पड़ने वाले ब्रह्माकुमारी शांति उद्यान (पीस पार्क) और देलवाड़ा मंदिर को देख सकते हैं। 

पिछला दिन और शाम हमने नक्की झील के आस पास के इलाके में गुजारी थी। सच कहूँ तो शहर का मुख्य हिस्सा आपको इस बात का अहसास नहीं करा पाता कि आप एक सुंदर से हिल स्टेशन में पधारे हैं। पर सुबह हम मुख्य मार्ग छोड़ कर जैसे ही शहर से चार पाँच किमी आगे बढ़े तब जाकर वो खूबसूरती दिखाई दी जिसकी उम्मीद हम पिछले दिन से ही लगाए बैठे थे। अरावली की छोटी छोटी पहाड़ियों के बीच पतली सी सड़क पर बढ़ती हमारी गाड़ी जब इस झील की बगल से गुजरी तो इसे देखकर मन प्रसन्न हो गया। चारों ओर से हरे भरे पेड़ों से घिरी इस झील का जल बिल्कुल शांत था। न पर्यटकों की भीड़ , ना नौकाओं की हलचल। ऐसा लगता था मानो इस हरियाली के बीच वो अपने आप में ही रमी हुई हो।

यहाँ के लोग इसे छोटी नक्की झील (Mini Nakki Lake) या ओरिया झील (Oriya Lake) भी  कहते हैं। ये प्राकृतिक झील नहीं है। दशकों पहले इस इलाके में लगातार आ रहे अकालों से निबटने के लिए यहाँ सरकार ने झील के लिए खुदाई शुरु करायी। मजदूरों को इस खुदाई के बदले निर्माण अवधि में रसद मुहैया कराई गयी। इस झील से थोड़ा आगे बढ़ने पर ओरिया का चेक पोस्ट आ जाता है। यहाँ से दो रास्ते अलग होते हैं एक दाहिनी ओर अचलगढ़ (Achalgarh) को चला जाता है।  

Monday 23 April 2012

रंगीलो राजस्थान : मूली रे मूली तू क्यूँ हुई इतनी रंगीली ?

हमारा देश विविधता से भरा देश है। देश के एक कोने से दूसरे कोने में सफ़र करते वक़्त ना केवल लोगों की भाषा और पहनावे में फर्क आता है बल्कि वहाँ के पशु धन और शाक सब्जी भी विविधता लिए हुए होते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में अगर अपनी गौ माता को देखें तो निरीह सी लगेंगी पर वहीं राजस्थान में इन गायों की कद काठी और नुकीले सींग दोनों जबरदस्त होते हैं। 

जो इस चिट्ठे के पुराने हमसफ़र हैं ‌उन्हें याद होगा कि मुन्नार की यात्रा में हमें कैसी बड़ी बड़ी हरी मिर्चें देखने को मिली थीं। जिस तरह राजस्थान में उदयपुर के ग्रामीण इलाकों में बच्चे शरीफा बेचते नज़र आए वही केरल के मुन्नार में हमें जगह जगह हरे पत्तों के साथ तुरंत तोड़े हुए ताजे गाजर बेचती महिलाएँ नज़र आयीं।

वहीं माउंट आबू में जब हम गुरुशिखर की यात्रा पर निकले तो बीच के नाके पर हमने  इस रंग रंगीली मूली को देखा और एक नज़र में ही हम सभी इस पर फि़दा हो गए। स्वाद भी जनाब अपने तरफ़ मिलने वाली सफेद मूली से कहीं मीठा 


वैसे राजस्थान के रेगस्तानी इलाके में एक बार फिर हमारा ऍसे ही एक रंगीन फल से सामना हुआ। उसका स्वाद हम ले पाए या नहीं वो किस्सा तो बाद में जल्द ही हाज़िर होता हूँ गुरुशिखर की आनंददायक यात्रा का विवरण लेकर..

 मुसाफिर हूँ यारों हिंदी का एक यात्रा ब्लॉग

Tuesday 17 April 2012

दास्तां नक्की झील की : आख़िर क्यूँ याद आए मुझे 'बलम रसिया' ?

पिछली पोस्ट में उदयपुर से चलते हुए हम जा पहुँचे थे माउंट आबू में। शाम का वक़्त था । नक्की झील हमारे सामने थी। एक रास्ता गाँधी घाट को जा रहा था जहाँ बोटिंग करने के लिए भारी भीड़ जुटी थी। नक्की झील कोई बहुत बड़ी झील नहीं है। हमें लगा कि जितना समय कतार में लगकर नौका की प्रतीक्षा में लगेगा उससे अच्छा वक़्त झील के किनारे किसी शांत सी जगह पर काटा जा सकता है। घाट से थोड़ी दूर छोटे छोटे दुकानदार लोक लुभावन  वस्तुओं के साथ पर्यटकों को आकर्षित कर रहे थे। हमने भी थोड़ी मोड़ी खरीददारी की और पास ही पानी में बने जहाजनुमा रेस्टोरेन्ट में चल पड़े। ये भोजनालय झील के दक्षिण पूर्वी किनारे पर स्थित है।


दरअसल रेस्टोरेंट उस वक़्त बिल्कुल खाली था। सारी भीड़ नौका विहार का आनंद लेने में मशगूल थी। चूंकि भीड़ के आने का समय नहीं हुआ था इसलिए बैरे भी इधर उधर थे। पानी के समीप शांति से बैठने का ये अनुकूल अवसर था।

सरोवर रेस्टोरेन्ट के डेक से झील का रमणीक दृश्य दिख रहा था। झील की दूसरी ओर की पहाड़ियों के नीचे उठते श्वेत फ्व्वारे और उन फव्वारों के बीच  चलती भांति भांति आकारों से सुसज्जित छोटी बड़ी नावें। कुछ दिखने में शाही तो कुछ बेहद आम। नावों से थोड़ी दूर  झील का गश्त लगाती प्यारी प्यारी बत्तखों के ढेर सारे परिवार। वैसे देश की कई अन्य झीलों की तरह यहाँ की पहाड़ियों पर के जंगल घने नहीं हैं।

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